भारत का सबसे कम उम्र का ऐसे क्रांतिकारी हरकिशन सिंह सुरजीत " लंदन तोड़ सिंह " की भारतीय राजनीति की पूरी कहानी
✊ यह कहानी है एक ऐसे भारत के नेता और महान क्रांतिकारी की...
यह कहानी है कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत की — उस नेता की जिसने अपने जीवन की शुरुआत अंग्रेज़ी हुकूमत से टकराकर की, और अंत तक देश में धर्मनिरपेक्षता, किसानों के हक़ और वामपंथी विचारधारा की लौ को जलाए रखा।
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🔥 "लंदन तोड़ सिंह" की कहानी
1930, उम्र महज़ 14 साल। एक सिख बालक ने ब्रिटिश यूनियन जैक को उतारकर गर्व से भारतीय तिरंगा फहराया।
अदालत में पूछे जाने पर बोला:
> "मेरा नाम लंदन तोड़ सिंह है!"
जज ने सज़ा दी — 1 साल।
बालक बोला — "बस?"
जज ने बढ़ा दी — 2 साल, फिर 3, फिर 4...
हर बार एक ही जवाब — "बस?"
आखिरकार जज बोला:
"हां, बस — इससे ज़्यादा कानून में सज़ा का प्रावधान ही नहीं है!"
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🌾 क्रांति से किसानों तक
हरकिशन सिंह सुरजीत का जन्म 23 मार्च 1916, पंजाब में हुआ।
वे भगत सिंह, करतार सिंह सराभा और ग़दर पार्टी से प्रेरित हुए।
देश की आज़ादी के बाद उन्होंने CPI(M) को खड़ा किया और अखिल भारतीय किसान सभा के ज़रिए देशभर के किसानों को संगठित किया।
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📸 नेताओं के साथ उनके ऐतिहासिक रिश्ते
हरकिशन सिंह सुरजीत की अंतरराष्ट्रीय सोच का प्रमाण उनकी Fidel Castro के साथ ली गई तस्वीर है।
जब दुनिया पूंजीवाद और समाजवाद में बंटी थी, सुरजीत वामपंथी एकता और वैश्विक क्रांति के समर्थक थे।
Castro के साथ उनकी मुलाकात बताती है कि भारतीय वामपंथ भी अंतरराष्ट्रीय आंदोलनों से जुड़ा हुआ था।
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हालांकि सुरजीत वैचारिक रूप से भाजपा के खिलाफ थे, लेकिन व्यक्तिगत रिश्तों में उन्होंने कभी कटुता नहीं रखी।
अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उनकी तस्वीर इस बात का सबूत है कि
राजनीति विचारधारा की लड़ाई है, दुश्मनी की नहीं।
उन्होंने लोकतंत्र को लोकतंत्र की तरह जिया। विरोधी विचारधारा के साथ भी संवाद बनाए रखा।
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आपकी दी गई तस्वीर जिसमें सुरजीत लालू यादव के साथ बैठे हैं —
वह उस समय की है जब वे भाजपा के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष मोर्चे को मज़बूत कर रहे थे।
उन्होंने लालू जैसे नेताओं को साथ लाकर राष्ट्रव्यापी गठबंधन तैयार किया।
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ज्योति बसु और सुरजीत साथ-साथ वामपंथी राजनीति की रणनीति बनाते थे।
पश्चिम बंगाल से दिल्ली तक दोनों का तालमेल भारतीय राजनीति को प्रभावित करता रहा।
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🧠 रणनीति के मास्टर: 2004 का चमत्कार
2004 लोकसभा चुनाव में जब वाजपेयी सरकार को अजेय माना जा रहा था,
तो सुरजीत ने पर्दे के पीछे से विपक्षी दलों को एकजुट किया।
उनके प्रयासों से यूपीए बना और एनडीए सत्ता से बाहर हो गया।
यह इतनी बड़ी जीत थी कि पांचजन्य (RSS का मुखपत्र) ने लिखा:
> "यह पारी सुरजीत के नाम थी।"
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⚰️ अंतिम संदेश — "लड़ते रहो"
1 अगस्त 2008 को कामरेड सुरजीत का निधन हुआ।
जाते-जाते उन्होंने साथियों से कहा:
> 👉 "फासीवाद, सांप्रदायिकता और पूंजीवादी शोषण के खिलाफ लड़ते रहो।"
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🕯️ विचार अमर हैं
सुरजीत चले गए, लेकिन उनके विचार आज भी ज़िंदा हैं —
किसान आंदोलनों, धर्मनिरपेक्ष ताक़तों और समाजवादी राजनीति में।
>✊ "कम्युनिस्ट मरते नहीं — वे विचार बनकर जिंदा रहते हैं।"
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🙏 श्रद्धांजलि
कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत की पुण्यतिथि पर
✊ लाल सलाम!
🕯️ इंकलाब ज़िंदाबाद!
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